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खुशियों का पता

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मुझसे सब पूछते हैं ख़ुशी का पता,
कैसे दूँ मैं किसी अजनबी का पता।
लेकर पर्वत से सागर तलक उसका घर,
कितना फैला हुआ है नदी का पता?
ज़िन्दगी भर रहा ज़िन्दगी ढूढ़ते,
मिल न पाया मुझे उस ज़िन्दगी का पता।
पर्वतों पर नहीं, दिल की गहराई में,
ढूंढ लो उस अजनबी का पता।
जिसकी बाहो में अपनी मंजिल दिखे,
उन बाहो में है, असली जिंदगी का पता।
आंसुओं से जहाँ मुस्कुराहट मिले,
बस वो संगम ही है खुशियों का पता।

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