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संस्कारी गरीबी

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नगरी मेरी संस्कारी है, पढ़े लिखो की भरमारी है।
नवरात्रि के धूम के बाद, अगले हफ्ते दीवाली है।।
चौराहे पे ये दिखते मुझको, न जाने क्या लाचारी है।
आंखों में है लाखो सपने, लेकिन भूक से ये हारी है।।
नगरी मेरी संस्कारी है, पढ़े लिखो की भरमारी है ।।
सरकार मेरी है कलसे छुटी पर, आ रही दीवाली है।
खा खा के पेट भारी है, लगी भ्रस्टाचार की बीमारी है।।
खाली पेट ये सोइ थी कलतक, आज भी पेट खाली है।
पढे लिखें न देखे इसको, लगी अंधो की बीमारी है ।।
नगरी मेरी संस्कारी है, पढ़े लिखो की भरमारी है ।।
रास्तो पे पले बढ़े , फुटपाथों पे इनके आशियाने है।
चार पहिया जब गाड़ी रुकती, खिड़की से दिखते सयाने है।।
आधा टुकड़ा झूठा फेकते, गरीबी का मजाक उड़ाते है।।
नशे में गाड़ी चलाकर येतो , फुटपाथों से गरीबी हटाते है ।।
नगरी मेरी संस्कारी है, पढ़े लिखो की भरमारी है।।
अपने विचार – गंगेश शुक्ला

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